शनैश्चर स्तवराज || Sanaischara Stavarajah || Sanaischara Stavraj

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शनैश्चर स्तवराज || Sanaischara Stavarajah || Sanaischara Stavraj

शनैश्चर स्तवराज का उल्लेख भविष्य पुराण में देखने को मिलता हैं ! Sanaischara Stavarajah को नियमित पाठ करने से शनि सबंधित समस्या और रोगों से मुक्ति मिलती हैं ! शनैश्चर स्तवराज पढ़ने से जातक के असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं ! Sanaischara Stavarajah को पढ़ने से शनिदेव की प्रसन्नता और कृपा प्राप्त होती है ! Sanaischara Stavarajah आदि के बारे में बताने जा रहे हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 9667189678 Sanaischara Stavarajah By Online Specialist Astrologer Sri Hanuman Bhakt Acharya Pandit Lalit Trivedi.

शनैश्चर स्तवराज || Sanaischara Stavarajah || Sanaischara Stavraj

नारद उवाच-

ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजा युधिष्ठिरः।

धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम्  ॥१॥

शिरो मे भास्करः पातु भालम् छायासुतोऽवतु।

कोटराक्षो दृशौ पातु शितिकण्ठनिभःश्रुती ॥२॥

घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोऽवतु।

स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोऽवतु॥३॥

सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोऽवतु।

ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः ॥४॥

पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः।

रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम्॥५॥

सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः।

सौरिः शनैश्चरः कृष्णो नीलोत्पलनिभः शनिः ॥६॥

शुष्कोदरो विशालाक्षो दुर्निरीक्ष्यो विभीषणः

शितिकण्ठनिभो नीलश्छायाहृदयनन्दनः॥७॥

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कालदृष्टिः कोटराक्षः स्थूलरोमावलीमुखः।

दीर्घो निर्मांसगात्रस्तु शुष्को घोरो भयानकः ॥८॥

नीलांशुः क्रोधनो रौद्रो दीर्घश्मश्रुजटाधरः।

मन्दो मन्दगतिः खञ्जस्तृप्तः संवर्तको यमः॥९॥

ग्रहराजः कराली च सूर्यपुत्रो रविः शशी।

कुजो बुधो गुरुः काव्यो भानुजः सिंहिकासुतः ॥१०॥

केतुर्देवपतिर्बाहुः कृतान्तो नैऋतस्तथा।

शशी मरुत् कुबेरश्च ईशानः सुर आत्मभूः ॥११॥

विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारः काम ईश्वरः।

कर्ता हर्ता पालयिता राज्येशो राज्यदायकः॥१२॥

छायासुतः श्यामलाङ्गो धनहर्ता धनप्रदः।

क्रूरकर्मविधाता च सर्वधर्मावरोधकः॥१३॥

तुष्टो रुष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः ।

ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः॥१४॥

स्थिरासनः स्थिरगतिर्महाकायो महाबलः।

महाप्रभो महाकालः कालात्मा कालकालकः ॥१५॥

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आदित्यभयदाता च मृत्युरादित्यनन्दनः।

शतभिङृक्षदयितः त्रयोदशीतिथिप्रियः॥१६॥

तिथ्यात्मकस्तिथिगणो नक्षत्रगणनायकः।

योगराशिमुहूर्तात्मा कर्ता दिनपति प्रभुः॥१७॥

शमीपुष्पप्रियः श्यामस्त्रैलोक्याभयदायकः।

नीलवासाः क्रियासिन्धुर्नीलाञ्जनचयच्छविः ॥१८॥

सर्वरोगहरो देवः सिद्धो देवगणस्तुतः ।

अष्टोत्तरशतं नाम्नां सौरेश्छायासुतस्य यः॥१९॥

पठेन्नित्यं तस्य पीडा समस्ता नश्यति ध्रुवम्।

कृत्वा पूजां पठेन्मर्त्यो भक्तिमान् यः स्वयं सदा॥२०॥

विशेषतः शनिदिने पीडा तस्य विनश्यति।

जन्मलग्ने स्थितेवापि गोचरे क्रूरराशिगे॥२१॥

दशासु च गते सौरौ तदा स्तवमिमं पठेत्।

पूजयेद्यः शनिं भक्त्या शमीपुष्पाक्षताम्बरैः॥२२॥

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विधाय लोहप्रतिमां नरो दुःखाद्विमुच्यते ।

बाधयाऽन्यग्रहाणां च यः पठेत्तस्य नश्यति ॥२३॥

भीतो भयाद्विमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।

रोगी रोगाद्विमुच्येत नरः स्तवमिमं पठेत् ॥२४॥

पुत्रवान् धनवान् श्रीमान् जायते नात्र संशयः॥२५॥

नारद उवाच-

स्तोत्रं निशम्य पार्थस्य प्रत्यक्षोऽभूत् शनैश्चरः।

दत्वा राज्ञे वरं कामं शनिश्चान्तर्दधे तदा ॥२६॥

॥ इति श्रीभविष्यत्पुराणे शनैश्चरस्तवराजः समाप्तः ॥

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