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गोपाल विंशति: || Gopala Vimsati || Gopala Vimsathi
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गोपाल विंशति: || Gopala Vimsati || Gopala Vimsathi
श्रीमान् वेंकटनाथार्यः कवितार्किककेसरी ।
वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥
वन्दे वृन्दावनचरं वल्लवीजनवल्लभम्।
जयन्तीसंभवं धाम वैजयन्तीविभूषणम्॥१॥
वाचं निजाङ्करसिकां प्रसमीक्षमाणो वक्त्रारविन्दविनिवेशितपाञ्चजन्यः ।
वर्णत्रिकोणरुचिरे वरपुण्डरीके बद्धासनो जयति वल्लवचक्रवर्ती ॥२॥
आम्नायगन्धरुचिरस्फुरिताधरोष्ठ- मस्राविलेक्षणमनुक्षणमन्दहासम्।
गोपालडिंभवपुषं कुहनाजनन्याः प्राणस्तनन्धयमवैमि परं पुमांसम् ॥३॥
आविर्भवत्यनिभृताभरणं पुरस्ता- दाकुञ्चितैकचरणं निहितान्यपादम्।
राधानिबद्धमुकुरेण निबद्धतालं नाथस्य नन्दभवने नवनीतनाट्यम् ॥४॥
कुन्दप्रसूनविशदैर्द्दशनैश्चतुर्भिः सन्दश्य मातुरनिशं कुचचूचुकाग्रम्।
नन्दस्य वक्त्रमवलोकयतो मुरारे- र्मन्दस्मितं मम मनीषितमातनोतु ॥५॥
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हर्तुं कुम्भे विनिहितकरः स्वादुहैयंगवीनं दृष्ट्वा चापग्रहणचटुलां मातरं जातरोषाम् ।
पायादीषत्प्रचलितपदो नावगच्छन्नतिष्ठ- न्मिथ्यागोपः सपदि नयने मीलयन् विश्वगोप्ता॥६॥
व्रजयोषिदपाङ्गवेदनीयं मथुराभाग्यमनन्यभाग्यमीडे।
वसुदेववधूस्तनन्धयं तत् किमपिब्रह्म किशोरभावदृश्यम्॥७॥
परिवर्तितकन्धरं भयेन स्मितफुल्लाधरपल्लवं स्मरामि।
विटपित्वनिरासकं कयोश्चिद्विपुलोलूखलकर्षकं कुमारम् ॥८॥
निकटेषु निशामयामि नित्यं निगमान्तैरधुनापिमृग्यमाणम्।
यमलार्जुनदृष्टबालकेलिं यमुनासाक्षिकयौवतं युवानम् ॥९॥
पदवीमदवीयसीं विमुक्तेरटवीसंपदमंबुवाहयन्तीं।
अरुणाधरसाभिलाषवंशां करुणां कारणमानुषं भजामि ॥१०॥
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अनिमेषनिषेवनीयमक्ष्णो- रजहद्यौवनमाविरस्तु चित्ते।
कलहायितकुन्तलं कलापैः करुणोन्मादकविग्रहं विभो मे ॥११॥
अनुयायि मनोज्ञवंशनालै रवतु स्पर्शितवल्लवी विमोघैः।
अनघस्मितशीतलैरसौ मा- मनुकंपासरिदंबुजैरपांगैः ॥१२॥
अधराहितचारुवंशनाला मुकुटालंबिमयूरपिञ्छमालाः।
हरिनीलशिलाविहंगलीलाः प्रतिभासन्तु ममान्तिमप्रयाणे॥१३॥
अखिलानवलोकयामि कालान् महिलालीनभुजान्तरस्य यूनि ।
अभिलाषपदं व्रजांगनाना- मभिलापक्रमदूरमाभिरूप्यम् ॥१४॥
महसे महितायमौलिना विनतेनाञ्जलिमञ्जनत्विषे।
कलयामि विदग्धवल्लवी- वलयाभाषितमञ्जुवेणवे ॥१५॥
जयतु ललितनृत्यं शिक्षतो वल्लवीनां शिथिलवलयशिञ्जा शीतलैर्हस्ततालैः।
अखिलभुवनरक्षागोपवषस्य विष्णो- रधरमणिसुधाया वंशवान् वंशनालः ॥१६॥
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चित्राकल्पश्रवसि कलयन् लांगलीकर्णपूरं बर्होत्तंसस्फुरितचिकुरो बन्धुजीवं दधानः।
गुञ्जां बद्धामुरसि ललितां धारयन् हारय़ष्टिं गोपस्त्रीणां जयति कितवो कोऽपि कामापहारी ॥१७॥
लीलायष्टिं करकिसलये दक्षिणे न्यस्य धन्या- मंसे देव्याः पुलकनिबिडे सन्निविष्टान्यबाहुः।
मेघश्यामो जयति ललितं मेखलादत्तवेणु- र्गुञ्जापीडस्फुरितचिकुरो गोपकन्याभुजंगः॥१८॥
प्रीत्यालीढस्मृतिमधिगतां प्राप्तगाढांगपालीं पश्चादीषन्मिलितनयनां प्रेयसीं प्रेक्षमाणः।
भस्त्रायंत्रप्रणिहितकरो भक्तजीवातुरव्या- द्वारिक्रीडानिबिडवसनो वल्लवीवल्लभो नः ॥१९॥
वासोहृत्वा दिनकरसुता सन्निधौ वल्लवीनां लीलास्मेरो जयति ललितामास्थितः कन्दशाखाम्।
सव्रीडाभिस्तदनु वसनं ताभिरभ्यर्थ्यमानः कामी कश्चित् करकमलयोरञ्जलिं याचमानः ॥२०॥
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