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गुरु स्तोत्रम् || Guru Stotra || Guru Stotram

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गुरु स्तोत्रम् || Guru Stotra || Guru Stotram

गुरु स्तोत्रम् अपने गुरु जी के लिए की गई स्तुति हैं ! गुरु स्तोत्रम् आदि के बारे में बताने जा रहे हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 9667189678 Guru Stotra By Online Specialist Astrologer Sri Hanuman Bhakt Acharya Pandit Lalit Trivedi.

गुरु स्तोत्रम् || Guru Stotra || Guru Stotram

।। श्रीमहादेव्युवाच ।।

गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा ।

विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे ।।

श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्रीगुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में विशेष वर्णन करें ।

।। श्रीमहादेव उवाच ।।

जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् ।

उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।1।।

श्री महादेवजी बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग, पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु- इन सबमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।1।।

प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् ।

भार्यामिष्टंं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।2।।

प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कोई भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।2।।

वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम् ।

साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।3।।

वानप्रस्थ धर्म, यति विषयक धर्म, परमहंस के धर्म, भिक्षुक अर्थात् याचक के धर्म, साधु-सेवारूपी गृहस्थ-धर्म व बहुत से सुखों का भोग – इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।3।।

विष्णो भक्तिं पूजनरक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम् ।

विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।4।।

भगवान श्रीविष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु-भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं, इस प्रकार की पिता की सेवा -इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।4।।

प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायां न्यासविधानम् ।

इष्टे पूजा जप तपभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।5।।

प्रत्याहार और इन्द्रियों का दमन, प्राणायाम, न्यास-विन्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्र-जप, तपस्या व भक्ति- इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।5।।

काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा ।

श्रीमातंगी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम्। ।6।।

काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरासुंदरी, भीमा, बगलामुखी (पूर्णा), मातंगी, धूमावती व तारा- ये सभी मातृशक्तियाँ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।6।।

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मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम् ।

नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।7।।

भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनकी लीलाएँ, चरित्र एवं तप आदि भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।7।।

श्रीभृगुदेवं श्रीरघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम् ।

अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।8।।

भगवान के श्री भृगु, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदों में वर्णित दस अवतार श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।8।।

गंगा काशी काञ्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा ।

यमुना रेवा पुष्करतीर्थं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।9।।

गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ, काशी, कांची, पुरी, हरिद्वार, द्वारिका, उज्जयिनी, मथुरा, अयोध्या आदि पवित्र पुरियाँ व पुष्करादि तीर्थ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।9।।

गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर-रटनम् ।

एतत् सर्वं सुन्दरि ! मातर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।10।।

हे सुंदरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण एवं श्रीवृन्दावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन – ये सब भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।10।।

तुलसीसेवा हरिहरभक्तिः गंगासागर-संगममुक्तिः ।

किमपरमधिकं कृष्णेभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।11।।

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तुलसी की सेवा, विष्णु व शिव की भक्ति, गंगासागर के संगम पर देह-त्याग और अधिक क्या कहूँ परात्पर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।11।।

एतत् स्तोत्रं पठति च नित्यं मोक्षज्ञानी सोऽपि च धन्यम् ।

ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद् ध्येयं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।12।।

इस स्तोत्र का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान एवं मोक्ष दोनों को पाकर धन्य हो जाता है । निश्चय ही समस्त ब्रह्माण्ड में जिस-जिसका भी ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।12।।

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