Dashrath Krit Shani Stotra || दशरथ कृत शनि स्तोत्र || Shani Stotra || Shani Stotram
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दशरथ कृत शनि स्तोत्र || Dashrath Krit Shani Stotra || Shani Stotra

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दशरथ कृत शनि स्तोत्र || Dashrath Krit Shani Stotra

जब किसी भी जातक की कुंडली में शनि ग्रह नीच का होकर या गोचर में बुरा प्रभाव दे रहा हो या शनि ग्रह की दशा और अन्तर्दशा में बुरा फ़ल दे तो दिए गये Dashrath Krit Shani Stotra का रोजाना जाप करने से शनि सम्बन्धित हो रही परेशानी से निजात मिलेगा ! Dashrath Krit Shani Stotra का रोजाना पाठ करने से शनि ग्रह अपना बुरा प्रभाव छोड़कर अच्छा फ़ल देने लग जाता हैं ! Online Specialist Astrologer Acharya Pandit Lalit Trivedi द्वारा बताये जा रहे दशरथ कृत शनि स्तोत्र || Dashrath Krit Shani Stotra को पढ़कर आप भी शनि ग्रह को अनुकूल बना सकोंगे !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! जय श्री मेरे पूज्यनीय माता – पिता जी !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें Mobile & Whats app Number : 9667189678 Dashrath Krit Shani Stotra By Online Specialist Astrologer Acharya Pandit Lalit Trivedi.

दशरथ कृत शनि स्तोत्र || Dashrath Krit Shani Stotra

विनियोगः- 

ॐ अस्य श्रीशनि-स्तोत्र-मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, सौरिर्देवता, शं बीजम्, निः शक्तिः, कृष्णवर्णेति कीलकम्, धर्मार्थ-काम-मोक्षात्मक-चतुर्विध-पुरुषार्थ-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

कर-न्यासः-

शनैश्चराय अंगुष्ठाभ्यां नमः। मन्दगतये तर्जनीभ्यां नमः। अधोक्षजाय मध्यमाभ्यां नमः। कृष्णांगाय अनामिकाभ्यां नमः। शुष्कोदराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। छायात्मजाय करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादि-न्यासः-

शनैश्चराय हृदयाय नमः। मन्दगतये शिरसे स्वाहा। अधोक्षजाय शिखायै वषट्। कृष्णांगाय कवचाय हुम्। शुष्कोदराय नेत्र-त्रयाय वौषट्। छायात्मजाय अस्त्राय फट्।

दिग्बन्धनः-

“ॐ भूर्भुवः स्वः” ( पढ़ते हुए चारों दिशाओं में चुटकी बजाएं। )

ध्यानः-

नीलद्युतिं शूलधरं किरीटिनं गृध्रस्थितं त्रासकरं धनुर्धरम्।

चतुर्भुजं सूर्यसुतं प्रशान्तं वन्दे सदाभीष्टकरं वरेण्यम्।।

रघुवंशेषु विख्यातो राजा दशरथः पुरा।

चक्रवर्ती स विज्ञेयः सप्तदीपाधिपोऽभवत्।।१

कृत्तिकान्ते शनिंज्ञात्वा दैवज्ञैर्ज्ञापितो हि सः।

रोहिणीं भेदयित्वातु शनिर्यास्यति साम्प्रतं।।२

शकटं भेद्यमित्युक्तं सुराऽसुरभयंकरम्।

द्वासधाब्दं तु भविष्यति सुदारुणम्।।३

एतच्छ्रुत्वा तु तद्वाक्यं मन्त्रिभिः सह पार्थिवः।

व्याकुलं च जगद्दृष्टवा पौर-जानपदादिकम्।।४

ब्रुवन्ति सर्वलोकाश्च भयमेतत्समागतम्।

देशाश्च नगर ग्रामा भयभीतः समागताः।।५

पप्रच्छ प्रयतोराजा वसिष्ठ प्रमुखान् द्विजान्।

समाधानं किमत्राऽस्ति ब्रूहि मे द्विजसत्तमः।।६

प्राजापत्ये तु नक्षत्रे तस्मिन् भिन्नेकुतः प्रजाः।

अयं योगोह्यसाध्यश्च ब्रह्म-शक्रादिभिः सुरैः।।७

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तदा सञ्चिन्त्य मनसा साहसं परमं ययौ।

समाधाय धनुर्दिव्यं दिव्यायुधसमन्वितम्।।८

रथमारुह्य वेगेन गतो नक्षत्रमण्डलम्।

त्रिलक्षयोजनं स्थानं चन्द्रस्योपरिसंस्थिताम्।।९

रोहिणीपृष्ठमासाद्य स्थितो राजा महाबलः।

रथेतुकाञ्चने दिव्ये मणिरत्नविभूषिते।।१०

हंसवर्नहयैर्युक्ते महाकेतु समुच्छिते।

दीप्यमानो महारत्नैः किरीटमुकुटोज्वलैः।।११

ब्यराजत तदाकाशे द्वितीये इव भास्करः।

आकर्णचापमाकृष्य सहस्त्रं नियोजितम्।।१२

कृत्तिकान्तं शनिर्ज्ञात्वा प्रदिशतांच रोहिणीम्।

दृष्टवा दशरथं चाग्रेतस्थौतु भृकुटीमुखः।।१३

संहारास्त्रं शनिर्दृष्टवा सुराऽसुरनिषूदनम्।

प्रहस्य च भयात् सौरिरिदं वचनमब्रवीत्।।१४

शनि उवाच-

पौरुषं तव राजेन्द्र ! मया दृष्टं न कस्यचित्।

देवासुरामनुष्याशऽच सिद्ध-विद्याधरोरगाः।।१५

मयाविलोकिताः सर्वेभयं गच्छन्ति तत्क्षणात्।

तुष्टोऽहं तव राजेन्द्र ! तपसापौरुषेण च।।१६

वरं ब्रूहि प्रदास्यामि स्वेच्छया रघुनन्दनः !

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दशरथ उवाच-

प्रसन्नोयदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः।।१७

रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन्।

सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी।।१८

याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं।

एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम्।।१९

प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा।

पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ! ।।२०

प्रार्थयामास हृष्टात्मा वरमन्यं शनिं तदा।

नभेत्तव्यं न भेत्तव्यं त्वया भास्करनन्दन।।२१

द्वादशाब्दं तु दुर्भिक्षं न कर्तव्यं कदाचन।

कीर्तिरषामदीया च त्रैलोक्ये तु भविष्यति।।२२

एवं वरं तु सम्प्राप्य हृष्टरोमा स पार्थिवः।

रथोपरिधनुः स्थाप्यभूत्वा चैव कृताञ्जलिः।।२३

ध्यात्वा सरस्वती देवीं गणनाथं विनायकम्।

राजा दशरथः स्तोत्रं सौरेरिदमथाऽकरोत्।।२४

दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।२५।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।२६

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।२७

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।२८

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ।।२९

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ।।३०

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।३१

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।३२

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।३३

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ।।३४

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः।

अब्रवीच्च शनिर्वाक्यं हृष्टरोमा च पार्थिवः।।३५

तुष्टोऽहं तव राजेन्द्र ! स्तोत्रेणाऽनेन सुव्रत।

एवं वरं प्रदास्यामि यत्ते मनसि वर्तते।।३६

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दशरथ उवाच-

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम्।

अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित्।।३७

प्रसादं कुरु मे सौरे ! वरोऽयं मे महेप्सितः।

शनि उवाच-

अदेयस्तु वरौऽस्माकं तुष्टोऽहं च ददामि ते।।३८

त्वयाप्रोक्तं च मे स्तोत्रं ये पठिष्यन्ति मानवाः।

देवऽसुर-मनुष्याश्च सिद्ध विद्याधरोरगा।।३९

न तेषां बाधते पीडा मत्कृता वै कदाचन।

मृत्युस्थाने चतुर्थे वा जन्म-व्यय-द्वितीयगे।।४०

गोचरे जन्मकाले वा दशास्वन्तर्दशासु च।

यः पठेद् द्वि-त्रिसन्ध्यं वा शुचिर्भूत्वा समाहितः।।४१

न तस्य जायते पीडा कृता वै ममनिश्चितम्।

प्रतिमा लोहजां कृत्वा मम राजन् चतुर्भुजाम्।।४२

वरदां च धनुः-शूल-बाणांकितकरां शुभाम्।

आयुतमेकजप्यं च तद्दशांशेन होमतः।।४३

कृष्णैस्तिलैः शमीपत्रैर्धृत्वाक्तैर्नीलपंकजैः।

पायससंशर्करायुक्तं घृतमिश्रं च होमयेत्।।४४

ब्राह्मणान्भोजयेत्तत्र स्वशक्तया घृत-पायसैः।

तैले वा तेलराशौ वा प्रत्यक्ष व यथाविधिः।।४५

पूजनं चैव मन्त्रेण कुंकुमाद्यं च लेपयेत्।

नील्या वा कृष्णतुलसी शमीपत्रादिभिः शुभैः।।४६

दद्यान्मे प्रीतये यस्तु कृष्णवस्त्रादिकं शुभम्।

धेनुं वा वृषभं चापि सवत्सां च पयस्विनीम्।।४७

एवं विशेषपूजां च मद्वारे कुरुते नृप !

मन्त्रोद्धारविशेषेण स्तोत्रेणऽनेन पूजयेत्।।४८

पूजयित्वा जपेत्स्तोत्रं भूत्वा चैव कृताञ्जलिः।

तस्य पीडां न चैवऽहं करिष्यामि कदाचन्।।४९

रक्षामि सततं तस्य पीडां चान्यग्रहस्य च।

अनेनैव प्रकारेण पीडामुक्तं जगद्भवेत्।।५०

दशरथ कृत शनि स्तोत्र के लाभ / फ़ायदे || Dashrath Krit Shani Stotra Ke Labh / Fayde

  • शनि ग्रह की महादशा और अंतर्दशा आपके लिए विपरीत चल रही है तो Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ करना आपके लिए लाभदायक रह सकता हैं। 
  • Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ शनि ग्रह के बुरे गोचर के समय करना भी जातक को फायदेमद रहता हैं। 
  • यदि आपके जीवन में शनि ग्रह से संबधित कोई रोग या बीमारी हो रही हो तो Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ उस समय जरूर करना चाहिए। 
  • जातक की कुंडली अनुसार शनि ग्रह मारकेश हो और आपके जीवन में शनि ग्रह प्रभावित कर रहा हो तो भी Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ करना आपको बहुत ज्यादा लाभ दे सकता हैं। 
  • यदि आप अपने जीवन में शनि ग्रह से होने वाले नुकसान या बुरे प्रभाव से किसी भी तरह से ग्रस्त चल रहे हो तो भी Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ करने से आपके जीवन में सुधार देखने को जरूर मिलेगा। 

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  • Dashrath Krit Shani Stotra का रोजाना पाठ पाठ करने से शनि ग्रह को मजबूत बनाया जा सकता हैं। 
  • यदि कुंडली में शनि ग्रह अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो भी रोजाना Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ करने से शनि ग्रह की शांति की जा सकती हैं। 
  • जिन जातकों की जन्म कुंडली में शनि ग्रह निर्बल अवस्था या पाप ग्रह से ग्रस्त से प्रभावित है तो Dashrath Krit Shani Stotra का नित्य पाठ करना आपको फायदा पहुँचा सकता हैं। 
  • शनि ग्रह ढैय्या एवम साढ़ेसाती में भी Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ करना बहुत उपयोगी रहता हैं। 
  • शनि देव की नित्य पूजा पाठ में Dashrath Krit Shani Stotra का पाठ करने से श्री शनि देव की कृपा बनी रहती हैं। 
  • Dashrath Krit Shani Stotra को प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल के समय करना चाहिए।

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