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माँ तारा प्रत्यंगिरा कवच || Maa Tara Pratyangira Kavacham || Tara Devi Pratyangira Kavacham

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माँ तारा प्रत्यंगिरा कवच || Maa Tara Pratyangira Kavacham

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माँ तारा प्रत्यंगिरा कवच || Maa Tara Pratyangira Kavacham

|| ईश्वर उवाच ||

ॐ तारायाः स्तम्भिनी देवी मोहिनी क्षोभिनी तथा ।

हस्तिनी भ्रामिनी रौद्री संहारण्यापि तारिणी ॥ १ ॥

शक्तयोहष्टौ क्रमादेता शत्रुपक्षे नियोजिताः ।

धारिता साधकेन्द्रेण सर्वशत्रु निवारिणी ॥ २ ॥

|| कवचमारम्भम् ||

ॐ स्तम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय ॥ ३ ॥

ॐ क्षोभिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् क्षोभय क्षोभय ॥ ४ ॥

ॐ मोहिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् मोहय मोहय ॥ ५ ॥

ॐ जृम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् जृम्भय जृम्भय ॥ ६ ॥

ॐ भ्रामिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् भ्रामय भ्रामय ॥ ७ ॥

ॐ रौद्री स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् सन्तापय सन्तापय ॥ ८॥

ॐ संहारिणी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् संहारय संहारय ॥ ९ ॥

ॐ तारिणी स्त्रें स्त्रें सर्वपद्भ्यः सर्वभूतेभ्यः सर्वत्र रक्ष रक्ष मां स्वाहा ॥ १० ॥

|| फलश्रुति ||

य इमां धारयेत् विद्यां त्रिसन्ध्यं वापि यः पठेत् ।

स दुःखं दूरतस्त्यक्त्वा ह्यन्याच्छ्त्रुन् न संशयः ॥ ११ ॥

रणे राजकुले दुर्गे महाभये विपत्तिषु ।

विद्या प्रत्यङ्गिरा ह्येषा सर्वतो रक्षयेन्नरं ॥ १२ ॥

अनया विद्यया रक्षां कृत्वा यस्तु पठेत् सुधी ।

मन्त्राक्षरमपि ध्यायन् चिन्तयेत् नीलसरस्वतीं ।

अचिरे नैव तस्यासन् करस्था सर्वसिद्धयः

ॐ ह्रीं उग्रतारायै नीलसरस्वत्यै नमः ॥ १३ ॥

इमं स्तवं धीयानो नित्यं धारयेन्नरः ।

सर्वतः सुखमाप्नोति सर्वत्रजयमाप्नुयात् ॥ १४ ॥

नक्कापि भयमाप्नोति सर्वत्रसुखमाप्नुयात् ॥ १५ ॥

इति रुद्रयामले श्रीमदुग्रताराय प्रत्यङ्गिरा कवचं समाप्तम् ॥

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