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श्री कृष्ण चन्द्रा अष्टकम || Sri Krishna Chandra Ashtakam || Krishna Chandra Ashtak

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श्री कृष्ण चन्द्रा अष्टकम || Sri Krishna Chandra Ashtakam || Krishna Chandra Ashtak

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श्री कृष्ण चन्द्रा अष्टकम || Sri Krishna Chandra Ashtakam || Krishna Chandra Ashtakam

महानीलमेघातिभव्यं सुहासं शिवब्रह्मदेवादिभिः संस्तुतश्च ।

रमामन्दिरं देवनन्दापदाहं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ १ ॥

रसं वेदवेदान्तवेद्यं दुरापं सुगम्यं तदीयादिभिर्दानवघ्नम् ।

लसत्कुण्डलं सोमवंशप्रदीपं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ २ ॥

यशोदादिसंलालितं पूर्णकामं दृशोरञ्जनं प्राकृतस्थस्वरूपम् ।

दिनान्ते समायान्तमेकान्तभक्तैर्भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ३ ॥

कृपादृष्टिसम्पातसिक्तस्वकुञ्जं तदन्तःस्थितस्वीयसम्यग्दशादम् ।

पुनस्तत्र तैः सत्कृतैकान्तलीलं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्दम् ॥ ४ ॥

गृहे गोपिकाभिर्धृते चौर्यकाले तदक्ष्णोश्च निक्षिप्य दुग्धं चलन्तम् ।

तदा तद्वियोगादिसम्पत्तिकारं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ५ ॥

चलत्कौस्तुभव्याप्तवक्षःप्रदेशं महावैजयन्तीलसत्पादयुग्मम् ।

सुकस्तूरिकादीप्तभालप्रदेशं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ६ ॥

गवा दोहने दृष्टराधामुखाब्जं तदानीं च तन्मेलनव्यग्रचित्तम् ।

समुत्पन्नतन्मानसैकान्तभावं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ७ ॥

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अदः कृष्णचन्द्राष्टकं प्रेमयुक्तः पठेत्कृष्णसान्निध्यमाप्नोति नित्यम् ।

कलौ यः स संसारदुःखातिरिक्तं प्रयात्येव विष्णोः पदं निर्भयं तत् ॥ ८ ॥

॥ इति श्रीरघुनाथप्रभुविरचितं श्रीकृप्णचन्द्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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