श्री प्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र || Shri Prahlad Kritam Ganesha Stotram

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श्री प्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र || Shri Prahlad Kritam Ganesha Stotram

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श्री प्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र || Shri Prahlad Kritam Ganesha Stotram

॥ श्रीगणेशस्तोत्रं प्रह्लादकृतम् ॥

श्री गणेशाय नमः ।

अधुना शृणु देवस्य साधनं योगदं परम् ।
साधयित्वा स्वयं योगी भविष्यसि न संशयः ॥ १॥

स्वानन्दः स्वविहारेण संयुक्तश्च विशेषतः ।
सर्वसंयोगकारित्वाद् गणेशो मायया युतः ॥ २॥

विहारेण विहीनश्चाऽयोगो निर्मायिकः स्मृतः ।
संयोगाभेद हीनत्वाद् भवहा गणनायकः ॥ ३॥

संयोगाऽयोगयोर्योगः पूर्णयोगस्त्वयोगिनः ।
प्रह्लाद गणनाथस्तु पूर्णो ब्रह्ममयः परः ॥ ४॥

योगेन तं गणाधीशं प्राप्नुवन्तश्च दैत्यप ।
बुद्धिः सा पञ्चधा जाता चित्तरूपा स्वभावतः ॥ ५॥

तस्य माया द्विधा प्रोक्ता प्राप्नुवन्तीह योगिनः ।
तं विद्धि पूर्णभावेन संयोगाऽयोगर्वजितः ॥ ६॥

क्षिप्तं मूढं च विक्षिप्तमेकाग्रं च निरोधकम् ।
पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च सा माया गणपस्य वै ॥ ७॥
क्षिप्तं मूढं च चित्तं च यत्कर्मणि च विकर्मणि ।
संस्थितं तेन विश्वं वै चलति स्व-स्वभावतः ॥ ८॥

अकर्मणि च विक्षिप्तं चित्तं जानीहि मानद ।
तेन मोक्षमवाप्नोति शुक्लगत्या न संशयः ॥ ९॥

एकाग्रमष्टधा चित्तं तदेवैकात्मधारकम् ।
सम्प्रज्ञात समाधिस्थम् जानीहि साधुसत्तम ॥ १०॥

निरोधसंज्ञितं चित्तं निवृत्तिरूपधारकम् ।
असम्प्रज्ञातयोगस्थं जानीहि योगसेवया ॥ ११॥

सिद्धिर्नानाविधा प्रोक्ता भ्रान्तिदा तत्र सम्मता ।
माया सा गणनाथस्य त्यक्तव्या योगसेवया ॥ १२॥

पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च बुद्धिरूपा प्रकीर्तिता ।
सिद्ध्यर्थं सर्वलोकाश्च भ्रमयुक्ता भवन्त्यतः ॥ १३॥

धर्मा-ऽर्थ-काम-मोक्षाणां सिद्धिर्भिन्ना प्रकीर्तिता ।
ब्रह्मभूतकरी सिद्धिस्त्यक्तव्या पंचधा सदा ॥ १४॥
मोहदा सिद्धिरत्यन्तमोहधारकतां गता ।
बुद्धिश्चैव स सर्वत्र ताभ्यां खेलति विघ्नपः ॥ १५॥

बुद्ध्या यद् बुद्ध्यते तत्र पश्चान् मोहः प्रवर्तते ।
अतो गणेशभक्त्या स मायया वर्जितो भवेत् ॥ १६॥

पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च पञ्चधा सिद्धिमादरात् ।
त्यक्वा गणेशयोगेन गणेशं भज भावतः ॥ १७॥

ततः स गणराजस्य मन्त्रं तस्मै ददौ स्वयम् ।
गणानां त्वेति वेदोक्तं स विधिं मुनिसत्तम ॥ १८॥

तेन सम्पूजितो योगी प्रह्लादेन महात्मना ।
ययौ गृत्समदो दक्षः स्वर्गलोकं विहायसा ॥ १९॥

प्रह्लादश्च तथा साधुः साधयित्वा विशेषतः ।
योगं योगीन्द्रमुख्यं स शान्तिसद्धारकोऽभवत् ॥ २०॥

विरोचनाय राज्यं स ददौ पुत्राय दैत्यपः ।
गणेशभजने योगी स सक्तः सर्वदाऽभवत् ॥ २१॥
सगुणं विष्णु रूपं च निर्गुणं ब्रह्मवाचकम् ।
गणेशेन धृतं सर्वं कलांशेन न संशयः ॥ २२॥

एवं ज्ञात्वा महायोगी प्रह्लादोऽभेदमाश्रितः ।
हृदि चिन्तामणिम् ज्ञात्वाऽभजदनन्यभावनः ॥ २३॥

स्वल्पकालेन दैत्येन्द्रः शान्तियोगपरायणः ।
शान्तिं प्राप्तो गणेशेनैकभावोऽभवतत्परः ॥ २४॥

शापश्चैव गणेशेन प्रह्लादस्य निराकृतः ।
न पुनर्दुष्टसंगेन भ्रान्तोऽभून्मयि मानद!॥ २५॥

एवं मदं परित्यज ह्येकदन्तसमाश्रयात् ।
असुरोऽपि महायोगी प्रह्लादः स बभूव ह ॥ २६॥

एतत् प्रह्लादमाहात्म्यं यः शृणोति नरोत्तमः ।
पठेद् वा तस्य सततं भवेदोप्सितदायकम् ॥ २७॥

॥ इति मुद्गलपुराणोक्तं प्रह्लादकृतं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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